आइये जाने रहस्यमय मंदिर कैलाश मंदिर के बारे में । #JaunpurUpdateNews
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✍️वत्सल गुप्ता
दुनिया में कई मंदिर ऐसे हैं जो अपनी खूबसूरती के लिए जाने जाते हैं लेकिन हमारे देश भारत में एक ऐसा मंदिर भी है जो अपनी सुंदरता के पीछे हजारों रहे दबाए बैठा है।
यह मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के प्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं में स्तिथ है। यहां की गुफाएं सबसे प्रसिद्ध मानी जाती है। यहां पर गुफाओं के साथ-साथ एक हिंदू मंदिर भी है। इस मंदिर को किसी आम मंदिरों की तरह पत्थर से जोड़के नहीं बल्कि एक पहाड़ को काटकर वह भी ऊपर से नीचे की तरफ काटकर बनाया गया है।
कुछ लोगों का मानना है कि इसे अपने ढंग का अनूठा वास्तु जिसे मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (757-783 ई0) में निर्मित कराया था और ये सिर्फ 18 साल में ही बना कर पूरा कर दिया गया था।
यहां अन्य लयणों के समान भीतर से कोरा तो गया ही है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिर का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है।
इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसको बनाने में लगभग ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसको बनाने के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है।
इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में नन्दी है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हैं। यह कृति भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है।
✍️वत्सल गुप्ता
दुनिया में कई मंदिर ऐसे हैं जो अपनी खूबसूरती के लिए जाने जाते हैं लेकिन हमारे देश भारत में एक ऐसा मंदिर भी है जो अपनी सुंदरता के पीछे हजारों रहे दबाए बैठा है।
यह मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के प्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं में स्तिथ है। यहां की गुफाएं सबसे प्रसिद्ध मानी जाती है। यहां पर गुफाओं के साथ-साथ एक हिंदू मंदिर भी है। इस मंदिर को किसी आम मंदिरों की तरह पत्थर से जोड़के नहीं बल्कि एक पहाड़ को काटकर वह भी ऊपर से नीचे की तरफ काटकर बनाया गया है।
कुछ लोगों का मानना है कि इसे अपने ढंग का अनूठा वास्तु जिसे मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (757-783 ई0) में निर्मित कराया था और ये सिर्फ 18 साल में ही बना कर पूरा कर दिया गया था।
यहां अन्य लयणों के समान भीतर से कोरा तो गया ही है, बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिर का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है।
इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसको बनाने में लगभग ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसको बनाने के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है।
इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में नन्दी है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हैं। यह कृति भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है।
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