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    Jaunpur: कभी बच्चों के लिये साइकिल के उतरे टायर किसी बीएमडब्ल्यू कार से कम नहीं थे

    जौनपुर।कुछ दशक पहले गांवों में खेलों की अपनी परंपराएं थीं। शहर की चकाचौंध से दूर गांव में बाई स्कोप देखने की खुशी किसी सिनेमा हॉल से कम नहीं थी।  गाँव के बाहर सीवान मे पहलवान दण्ड बैठक लगाते थे तो कही कबड्डी का मुक़ाबला होता था तो कही  खिलाड़ी ताश खेल रहे थे, 

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    कभी बच्चे कांच के गोली खेलने में लगे थे, कभी पतंगबाजी प्रतियोगिता का दौर होता था।  इन सब के बीच कम आयु के बच्चे का खेल निराला होता था  बच्चों के लिये साइकिल के उतरे टायर किसी  बीएमडब्ल्यू कार से कम नहीं थे, बच्चे डंडे से टायरों को धक्का देकर मीलों दौड़ लगा लेते  थे, 

    और छोटी लड़कियां  का भी ' खेल मजेदार थे, प्रतियोगिता में लड़कियां रस्सी की सहायता से  कूद मे भाग लिया करती थीं और बच्चे लोहे की सारिया को  गोल  कर के तार की मदद से लोहे की छड़ को धक्का देते थे, और मीलों तक स्कूल जाते थे।

    गाँव मे सुविधा का आभाव होने के बाद भी जीवन बहुत मज़ेदार था  बरसात के दिनों मे जब तालाब और नालियां में पानी भरे होते थे तो एक साथ मिल कर मछली का एक साथ शिकार करना आम बात थी लोग मिट्टी के घरों में रहते थे। 

    जब वे वहां रहते थे तो इंसानों के साथ-साथ मिट्टी के घरों में रहते तो विषैले जन्तु भी अपना घोंसला बनाते थे।गांव की अधिकांश आबादी किसानों पर निर्भर थी, जहां खेती का काम खत्म होने के बाद लोग हुक्का पीने के लिए एक निश्चित स्थान पर जमा होते थे।  जहाँ गाँव के लोगों की समस्याओं के अलावा  राजनीति क चर्चा की जाती थी और आम जन मानस की समस्याओं का समाधान किया जाता था। 

     गाँव की इज्जत की  हमेशा सर्वोपरी  रहती थी । एक घर के चूल्हे की आग से पूरे मोहल्ले के घरों के चूल्हे जलते थे । गांव में एक आम कहावत थी कि आग और नमक माँगने वाले को मना नहीं करना चाहिए। शादी के समय पूरे गांव में खुशी का माहौल होता  था। शादी से  हफ्ता भर  पहले शादी होने वाले घरों से गीत गाने की आवाज़ें सुनाई देती थीं गाँव मे सुविधा के स्रोत कम होते थे लेकिन  गाँव के लोग मिल कर  गाँव से हांडी,  चारपाई आदि इकट्ठा करते थे और शादी आसनी से हो जाती थी । 

    बच्चों को संस्कार देना  पहली प्राथमिकताओं में था  जहां बच्चों को अपने बड़ों के सामने सम्मानपूर्वक बैठने को कहा जाता था। बड़ो  में बच्चों को खामोश रहने और चारपाई  के किनारे बैठने को कहा जाता था,  परिवार वाले बच्चों को  बड़ों का सम्मान करने के लिए प्रोत्साहित करते थे और गांव के बड़े उन्हें छोटी-छोटी गलतियों के बारे में फटकार लगा  देते थे।

     सर्दियों में ठंड से बचने के लिए कुछ दरवाजे पर  रात में इकट्ठा होते थे। जहाँ  कहानीकार चाय और बीड़ी का मुफ्त में व्यवस्था की जाती थी, और कहानीकार के सुर मे सुर मिलना पड़ता था। दिलचस्प था कि कुछ कहानीकार इतने कुशल थे कि रात कितनी भी लंबी क्यों न हो, कहानियाँ समाप्त नहीं होती। 

    कल्पना का उपयोग इस तरह से किया गया था कि श्रोता इसे सही मानते थे और गाँव का हवाला देकर और यह कहते हुए सुनाते थे कि गांव के बाहर फलाने पेड़ के पास कब्रिस्तान,देव स्थान  मैं और भूतों की लड़ाई में भोर हो गई और भूत भागने को विवश हो गया। कहानी मे राजा रानी और परियो की काहानी ज़रुर सुनाते थे जिसे लोग सच मान कर सुनते थे।

     दशकों पहले इलाके को लोग इंडोनेशिया सिंगापुर से साइकल लाते थे जिसका सम्मान किसी कार से कम नहीं था उस समय  जीवन प्रदूषण मुक्त हुआ करता था।  समय बदला, गांव की भागदौड़ भरी जिंदगी कही जाए या  कुदरत की मार , बारिश न होने से नहरों और तालाबों की कोख भरना  मुश्किल हो जाता है, गाँव से अलाव जलाने की परंपरा कम हो गई तो कहानीकार भी खत्म हो रहे हैं। 

    शादी की व्यवस्था टेंट हाउस तक पहुँच गयी  है ,शादी वाले घरों से अब गीत गाने की आवाज़ आना  कम  हो गयी है  । बाईसकोप की जगह mobile पर फिल्म व दूसरे ज़रुर कामो को पूरा किया जाता है।  अब बच्चे अब साइकिल से उतर टायर दौड़ना के बजाय  साइकिल व  मोटरसाइकिल और कारों के साथ सड़को पर दौड़ने लगे है।  किसानी  का काम सिमटता जा रहा है, लोग आजीविका के लिए देश-विदेश में रह रहे हैं। यह सच है कि व्यक्ति कितना भी विकसित हो जाए, वह अपने अतीत और यादों को नहीं भूल सकता ,गाँव के लोग आज भी गाँव की पगडंडीयो को याद करके आँख मे पानी भर जता है और मातृ भूमि की याद आती है।

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